कभी यूँ भी तो हो ...............

on Thursday, September 16, 2010

कभी यूँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ



कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ



कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें



कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ



कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से



कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो

और तुम आओ

अभिव्यक्ति : मोहब्बत क्या है

on Wednesday, May 27, 2009

मोहब्बत क्या है
वर्तमान में मोहब्बत क्या है एक अहसास... एक कशिश.... या फ़िर उन्मुक्त भावना.... जो हर किसी को देखते ही बरसात में जगह- जगह उग आए कुकुरमुत्ते की तरह उगता रहता है.... या फ़िर मोबाइल के आए नए माडल की तरह किसी हसीं चेहरों को देखकर.... अपने वर्तमान माडल के प्रति अफ़सोस करता रहता है.... अपनी मोहब्बत का यकीन दिलाने के लिए अपने तथाकथित महबूब के सामने .... गुटखे की तरह सुबह - शाम कस्मे खाया करता है..... और हर शाम बदलते चेहरों के साथ अपने प्यार की गहराई को..... जिस्मो में टटोलता रहता है.... और अपनी भूख की तृप्ति को प्यार के समर्पण की दर्शन मानता है... .....या इससे कुछ परे है ... वो एहसास....

मोहब्बत का बेस्ट यूज

on Wednesday, April 8, 2009

मोहब्बत का बेस्ट यूज
सर्दी की एक सुबह
कोहरे में लिपटी हर जगह
मै अपने महबूब से मिला
मेरे हाथो में सुर्ख गुलाब था
महबूब को देने का ख्याल था
वो मिली जिसका इंतजार था
मै धड़कते दिल से कहा
ये गुलाब मेरी मोहब्बत है
उसने हंसकर लिया और
धीरे से कहा
मै इसका बेस्ट यूज करूंगी
उसके हाथो में गुलाब
खिल रहा था
अपनी रंगत को निखर रहा था
वो धीरे - धीरे गुलाब की
पंखुडिया तोड़ रही थी
हर पंखुडी को लबों
पर ले रही थी
मेरी मोहब्बत का सुर्ख गुलाब
बिखर रहा था
उसकी रंगत का हर इक कतरा
महबूब के गले से उतरकर
उसकी रगों में सुर्ख लहू
बनकर दौड़ रहा था
मेरी मोहब्बत का बेस्ट यूज
हो रहा था........

सुबह की हवा

on Tuesday, April 7, 2009

सुबह के बजे है छत पे टहल रहा हूँ ठंढी हवा के झोंके मेरे गालो को चूम रही है। बदन पर बारिश की इठला कर पड़ती बूंदो की फुहार किसी ख्वाब की दुनिया में ले जाती है॥ उस बचपन की ओर जब बारिश में लोट पोट कर नहाना घंटो छत पर लेट कर बदन पर पड़ती बूंदों को महसूस करना और तैरते हुए कागज की नाव पर बैठी चीटी को दूर तक जाते देखना..... लेकिन आज की ये सुबह की ठंढी हवा और बारिश की बुँदे कुछ और भी महसूस करा रही है... आंखे बंद करके जब बूंदों को महसूस करता हूँ तो लगता है जैसे ये बूँद बदन को बेध कर मुझमे समां रही है... जैसे कोई प्रेयसी अपने प्रेमी के बदन से लता की तरह लिपट कर आत्मसात हो रही हो.......
हवा
ना कोई रंग है
ना कोई सीमा
तू भी भीगा
मै भी भीगा
तन मन भीगा सारा
तेरा भी है मेरा भी है
चाहे जितना ले लो.....